पंख । pankh
Wednesday, July 15, 2020
कविताएं
अव्यक्त अनुभूति
आलीशान इमारतें बनाने वाले मजदूर
कभी रह नहीं पाते
उन आलीशान इमारतों में
सुंदर महामार्ग बनाने वाले मजदूर
गुजरते हैं उन रास्तों से
टैक्स देकर
ऊंचे-ऊंचे पुलों को बनाते समय जो
धूप मिट्टी में सने थे बरसों तक
अब नहीं चढ़ पाते पुलों पर
बिना पर्ची कटाए
वो गुजरते हैं
उन आलीशान इमारतों
महामार्गों और पुलों के बगल से
और बता भी नहीं पाते कि
इस मिट्टी में दफन है
उनका कुछ कतरा लहू
उनकी मेहनत
उनके पसीने की धार
उनकी जवानी
और न जाने कितनी कहानी
वो बता नहीं पाते कि
यहीं खड़े होकर
न जाने कितने स्वतंत्रता दिवस
और गणतंत्र दिवस मनाए हैं
कितनी होली और दिवाली
घमेलों से ईंट गारा पत्थर गिराए हैं
वो बता नहीं पाते कि
इन महामार्गों
इन इमारतों
इन पुलों का निर्माण
करने के बाद बड़े गर्व से
निहारा था इनको जैसे
निहारती है एक मां
अपनी संतान को जन्म देने के बाद
भारती संजीव
मुंबई
Monday, October 17, 2016
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