अव्यक्त अनुभूति
आलीशान इमारतें बनाने वाले मजदूर
कभी रह नहीं पाते
उन आलीशान इमारतों में
सुंदर महामार्ग बनाने वाले मजदूर
गुजरते हैं उन रास्तों से
टैक्स देकर
ऊंचे-ऊंचे पुलों को बनाते समय जो
धूप मिट्टी में सने थे बरसों तक
अब नहीं चढ़ पाते पुलों पर
बिना पर्ची कटाए
वो गुजरते हैं
उन आलीशान इमारतों
महामार्गों और पुलों के बगल से
और बता भी नहीं पाते कि
इस मिट्टी में दफन है
उनका कुछ कतरा लहू
उनकी मेहनत
उनके पसीने की धार
उनकी जवानी
और न जाने कितनी कहानी
वो बता नहीं पाते कि
यहीं खड़े होकर
न जाने कितने स्वतंत्रता दिवस
और गणतंत्र दिवस मनाए हैं
कितनी होली और दिवाली
घमेलों से ईंट गारा पत्थर गिराए हैं
वो बता नहीं पाते कि
इन महामार्गों
इन इमारतों
इन पुलों का निर्माण
करने के बाद बड़े गर्व से
निहारा था इनको जैसे
निहारती है एक मां
अपनी संतान को जन्म देने के बाद
भारती संजीव
मुंबई
No comments:
Post a Comment