पंख । pankh
Wednesday, July 15, 2020
मुक्तक
काश समय से आ जाते
तो मुझको सोता ना पाते
मैं रोज तुम्हारी राहों में
पलकों को बिछाए रहती हूँ
तारे गिनगिन ,आसमान से
सपने को सजाए बैठी हूँ
बादल को हटाकर आ जाओ
तारों को सटाकर आ जाओ
कब तक मैं तकूँगी राह यूँ ही
तुम राह बनाकर आ जाओ
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